वह प्रेत जिसने कई सोखाओं को पीटा.... - डरावनी कहानियाँ

 उसे लगता है कि कई सोखाओं कोपक.... - डरावनी कहानियाँ

#पासजी





उसे लगता है कि कई सोखाओं कोपक.... - डरावनी कहानियाँ


 भूत-प्रेतों की लीला भी प्रकट होती है। कभी-कभी ये बहुत ही सजातीयता से पेश आते हैं तो कभी-कभी ये उग्र रूप में अच्छे-अच्छों की धोती जलन कर देते हैं। भूत-प्रेतों में बहुत कम ऐसे होते हैं जो आसानी से नशे में नहीं जाते हैं तो अधिकतर सोखों-पंडितों को पानी पिलाते रहते हैं, उनकी नानी की याद दिलाते हैं।


आज की कहानी एक ऐसे प्रेत की है जिसको कोई भी सोखा-पंडित अपने काबू में नहीं कर पाए और ना ही वह प्रेत किसी देवी-देवता से ही डरता था। क्या वह प्रेत ही था या कोई और??? आइए जानने की कोशिश करते हैं। हमारी भी इस प्रेत को जानने की उत्कंठा अतितीव्र हो गई थी जब हमने पहली बार ही इसके बारे में सुना। दरअसल लोगों से पता चला कि इस प्रेत ने बहुत सारे सोखाओं-पंडितों को घिसरा-घिसराकर मारा और इतना ही नहीं जब इसे किसी देवी या देवता के स्थान पर लेकर जाया गया तो इसने उस देवी या देवता की भी खुलकर खिल्ली उड़ाई और उन्हें चुनौती दे डाली कि पहले पहचान, मैं कौन??? और शायद इस कौन का उत्तर किसी के पास नहीं था चाहें वह सोखा हो या किसी देवी या देवता का बहुत बड़ा भक्त या पुजारी।


अभी से आप मत सोंचिए की यह कौन था जिसका पता बड़े-बड़े सोखा और पंडित तक नहीं लगा पाए? क्या इस कहानी को पढ़ने के बाद भी इस रहस्य से परदा नहीं उठेगा? इस रहस्यमयी प्रेत के 'पहचान मैं कौन' पर से परदा उठेगा और यह परदा शायद वह प्रेत ही उठाएगा क्योंकि उससे अच्छा उसको कौन समझ सकता है। बस थोड़ा इंतजार कीजिए और कहानी को आगे तो बढ़ने दीजिए।


यह कहानी हमारे गाँव-जवार की नहीं है। ये कहानी है हमारे जिले से सटे कुशीनगर जिले के एक गाँव की। यह गाँव पडरौना के पास है। अब आप सोंच रहे होंगे कि यह कहानी जब मेरे जिले की नहीं है तो फिर मैं इसे कैसे सुना रहा हूँ। मान्यवर इस गाँव में मेरी रिस्तेदारी पड़ती है अस्तु इस कहानी को मैं भी अच्छी तरह से बयाँ कर सकता हूँ।


भूत-प्रेतों की तरह से इस कहानी को रहस्यमयी न बनाते हुए मैं सीधे अपनी बात पर आ जाता हूँ। इस गाँव में एक पंडीजी हैं जो बहुत ही सुशील, सभ्य और नेक इंसान हैं। यह कहानी घटिट होने से पहले तक ये पंडीजी एक बड़े माने-जाने ठीकेदार हुआ करते थे और ठीके के काम से अधिकतर घर से दूर ही रहा करते थे। हप्ते या पंद्रह दिन में इनका घर पर आना-जाना होता था। ये ठीका लेकर सड़क आदि बनवाने का काम करते थे। इनके घर के सभी लोग भी बड़े ही सुशिक्षित एवं सज्जन प्रकृति के आदमी हैं। इनकी पत्नी तो साधु स्वभाव की हैं और एक कुशल गृहिणी होने के साथ ही साथ बहुत ही धर्मनिष्ठ हैं।


एकबार की बात है कि पंडीजी ठीके के काम से बाहर गए हुए थे पर दो दिन के बाद ही उनको दो लोग उनके घर पर पहुँचाने आए। पंडीजी के घरवालों को उन दो व्यक्तियों ने बताया कि पता नहीं क्यों कल से ही पंडीजी कुछ अजीब हरकत कर रहे हैं। जैसे कल रात को सात मजदूरों ने अपने लिए खाना बनाया था और ये जिद करके उनलोगों के साथ ही खाना खाने बैठे पर मजदूरों ने कहा कि पंडीजी पहले आप खा लें फिर हम खाएँगे। और इसके बाद जब ये खाना खाने बैठे तो सातों मजदूरो का खाना अकेले खा गए और तो और ये खाना भी आदमी जैसा नहीं निशाचरों जैसा खा रहे थे। उसके बाद दो मजदूर तो डरकर वहाँ से भाग ही गए। फिर हम लोगों को पता चला। उसके बाद हम लोग भी वहाँ पहुँचे और इनको किसी तरह सुलाए और सुबह होते ही इनको पहुँचाने के लिए निकल पड़े।


इसके बाद वे दोनों व्यक्ति चले गए और पंडीजी भी आराम से अपनी कोठरी में चले गए। कुछ देर के बाद पंडीजी लुँगी लपेटे घर से बाहर आए और घरवालों के मना करने के बावजूद भी खेतों की ओर निकल गए। घर का एक व्यक्ति भी (इनके छोटे भाई) चुपके से इनके पीछे-पीछे हो लिया। जब पंडीजी गाँव से बाहर निकले तो अपने ही आम के बगीचे में चले गए। आम के बगीचे में पहुँचकर कुछ समय तो पंडीजी टहलते रहे पर पता नहीं अचानक उनको क्या हुआ कि आम की नीचे झुलती हुई मोटी-मोटी डालियों को ऐसे टोड़ने लगे जैसे हनुमान का बल उनमें आ गया हो। डालियों के टूटने की आवाज सुनकर इनके छोटे भाई दौड़कर बगीचे में पहुँचे और इनको ऐसा करने से रोकने लगे। जब इनके छोटे भाई ने बहुत ही मान-मनौवल की तब पंडीजी थोड़ा शांत हुए और घर पर वापस आ गए।


इस घटना के बाद तो पंड़ीजी के पूरे परिवार के साथ ही इन पूरे गांव को भी संशय में जीने लगा। एक दिन फिर हुआ क्या की पांडीजी अपने ही दिखाई देने वाले अपने बच्चे को पढ़ रहे थे और उनकी पत्नी उसी स्थिति में रामायण पढ़ रही थीं इसलिए उनकी पत्नी क्या चाहती हैं कि पांडीजी की बॉडी फीकी जा रही है और चेहरा भी गुस्सा से लाल हो रहा है है। अभी पंडीजी की पत्नी कुछ समझती है तब तक पंडीजी अपने ही बेटे का सिर अपने मुंह में लेकर ऐसा लग रहा था कि जैसे चबा जा सकते हैं उनकी पत्नी डरी नहीं और संगी भाषा में बच्चे को वापस जाने की विनती कीं। अचानक पंडीजी बच्चे का सिर मुंह से निकालकर शांत होने लगे और रोते बच्चे का सिर सहलाने लगे।


इस घटना के बाद तो पंडीजी के घरवालों की चैन और नींद ही हराम हो गई। वे लोग पूजा-पाठ करवाने के साथ ही साथ कइ सारे डाक्टरों से संपर्क भी किए। यहाँ तक कि उन्हे कई बड़े-बड़े अस्पतालों में दिखाया गया पर डाक्टरों की कोई भी दवा काम नहीं की और इधर एक-दो दिन पर पंडीजी कोई न कोई भयानक कार्य करके सबको सकते में डालते ही रहे। डाक्टरों से दिखाने का सिलसिला लगभग 2 महीने तक चलता रहा पर पंडीजी के हालत में सुधार नाममात्र भी नहीं हुआ।


हाँ पर अब सबके समझ में एक बात आ गई थी और वह यह कि जब भी पंडीजी की शरीर फूलने लगती थी और उनका चेहरा तमतमाने लगता था तो घर वाले उनकी पत्नी को बुला लाते थे और पंडीजी अपनी पत्नी को देखते ही शांत हो जाते थे।


एकदिन पंडीजी की पत्नी पूजा कर रही थीं तभी पंडीजी वहाँ आ गए और अपनी पत्नी से हँसकर पूछे कि तुम पूजा क्यों कर रही हो? पंडीजी की पत्नी ने कहा कि आप अच्छा हो जाएँ , इसलिए। अपनी पत्नी की बात सुनकर पंडीजी ठहाका मार कर हँसने लगे और हँसते-हँसते अचानक बोल पड़े की कितना भी पूजा-पाठ कर लो पर मैं इसे छोड़नेवाला नहीं हूँ अगर मैं इसे छोड़ुँगा तो इसे इस लोक से भेजने के बाद ही। पंडीजी की यह बात सुनकर पंडीजी की पत्नी सहमीं तो जरूर पर उन्होंने हिम्मत करके पूछा आप कौन हैं और मेरे पति ने आपका क्या बिगाड़ा हैं? इसपर पंडीजी ने कहा कि मैं कौन हूँ यह मैं नहीं जानता और इसने मेरा क्या बिगाड़ा है मैं यह भी नहीं बताऊँगा।


पंडीजी की पत्नी ने जब यह बात अपने घरवालों को बताई तो पंडीजी के घरवालों ने उस जवार में जितने सोखा-पंडित हैं उन सबसे संपर्क करना शुरु किया। पहले तो कुछ सोखा-पंडितों ने झाड़-फूँक किया पर कुछ फायदा नहीं हुआ। एकदिन पंडीजी के घरवालों ने पंडीजी को लेकर उसी जवार (क्षेत्र) के एक नामी सोखा के पास पहुँचे। सोखाबाबा कुछ मंत्र बुदबुदाए और पंडीजी की ओर देखते हुए बोले कि तुम चाहें कोई भी हो पर तुम्हें इसे छोड़कर जाना ही होगा नहीं तो मैं तुम्हें जलाकर भस्म कर दूँगा। जब सोखाबाबा ने भस्म करने की बात कही तो पंडीजी का चेहरा तमतमा उठा और वे वहीं उस सोखा को कपड़े की तरह पटक-पटककर लगे मारने। सोखा की सारी शेखी रफूचक्कर हो गई थी और वह गिड़गिड़ाने लगा था। फिर पंडीजी की पत्नी ने बीच-बचाव किया और सोखा की जान बची।


पंडीजी द्वारा सोखा के पिटाई की खबर आग की तरह पूरे जवार क्या कई जिलों में फैल गई। अब तो कोई सोखा या पंडित उस पंडीजी से मिलना तो दूर उनका नाम सुनकर ही काँपने लगता था। इसी दौरान पंडीजी को लेकर एक देवी माँ के स्थान पर पहुँचा गया पर देवी माँ (देवी माँ जिस महिला के ऊपर वास करती थीं उस महिला ने देवी-वास के समय) ने साफ मना कर दिया कि वे ऐसे दुष्ट और असभ्य व्यक्ति के मुँह भी लगना नहीं चाहतीं। पंडीजी उस स्थान पर पहुँचकर मुस्कुरा रहे थे और अपनी पत्नी से बोले की जो देवी मेरे सामने आने से घबरा रही है वह मुझे क्या भगाएगी? देवी माँ ने पंडीजी के घरवालों से कहा कि यह कौन है यह भी पहचानना मुश्किल है। आप लोग इसे लेकर बड़े-बड़े तीर्थ-स्थानों पर जाइए हो सकता है कि यह इस पंडीजी को छोड़ दे।


इसके बाद पंडीजी के घरवाले पंडीजी को लेकर बहुत सारे तीर्थ स्थानों (जैसे मैहर, विंध्याचल, काशी, थावें, कुछ नामी मजार आदि) पर गए पर कुछ भी फायदा नहीं हुआ। यहाँ तक की अब पंडीजी अपने घरवालों के साथ इन तीर्थों पर आसानी से जाते रहे और घूमते रहे। अधिकतर तीर्थ-स्थान घूमाने के बाद भी जब वह प्रेत पंडीजी को नहीं छोड़ा तो पंडीजी के घरवाले घर पर ही प्रतिदिन विधिवत पूजा-पाठ कराने लगे। पंडीजी की पत्नी प्रतिदिन उपवास रखकर दुर्गा सप्तशती का पाठ करने लगीं।


एक दिन पंडीजी अपने घरवालों को अपने पास बुलाए और बोले की आप सभी लोग खेतों में जाकर कम से कम एक-एक पीपल का पेड़ लगा दीजिए। पंडीजी की पत्नी बोल पड़ी कि अगर आपकी यही इच्छा है तो एक-एक क्या हम लोग ग्यारह-ग्यारह पीपल का पेड़ लगाएँगे। इसके बाद पंडीजी के घरवाले पंडीजी को साथ लेकर उसी दिन खेतों में गए और इधर-उधर से खोजखाज कर एक-एक पीपल का पेड़ लगाए और पंडीजी से बोले कि हमलोग बराबर पीपल का पेड़ लगाते रहेंगे।


इस घटना के बाद पंडीजी थोड़ा शांत रहने लगे थे। अब वे अपने घर का छोटा-मोटा काम भी करने लगे थे। एक दिन पंडीजी के बड़े भाई घर के दरवाजे पर लकड़ी फाड़ रहे थे। पंडीजी वहाँ पहुँचकर टाँगी अपने हाथ में ले लिए और देखते ही देखते लकड़ी की तीन मोटी सिल्लियों को फाड़ दिए। शायद इन तीनों सिल्लियों को फाड़ने में उनके भाई महीनों लगाते।


एक दिन लगभग सुबह के चार बजे होंगे कि पंडीजी ने अपनी पत्नी को जगाया और बोल पड़े, "मैं जा रहा हूँ।" पंडीजी की पत्नी बोल पड़ी, "अभी तो रात है और इस रात में आप कहाँ जा रहें हैं?" अपनी पत्नी की यह बात सुनकर पंडीजी हँसे और बोले, "मैं जा रहा हूँ और वह भी अकेले। तेरे सुहाग को तेरे पास छोड़कर। अब मैं तेरे पति को और तुम लोगों को कभी तंग नहीं करूँगा। तूँ जल्दी से अपने पूरे घरवालों को जगवाओ ताकि जाने से पहले मैं उन सबसे भी मिल लूँ।" पंडीजी के इतना कहते ही पंडीजी की पत्नी के आँखों से झर-झर-झर आँसू झरने लगे और वे पंडीजी का पैर पकड़कर खूब तेज रोने लगीं। अब तो पंडीजी के पत्नी के रोने की आवाज सुनकर घर के लोग ऐसे ही भयभीत हो गए और दौड़-भागकर पंडीजी के कमरे में पहुँचे। अरे यह क्या पंडीजी के कमरे का माहौल तो एकदम अच्छा था क्योंकि पंडीजी तो मुस्कुराए जा रहे थे। घरवालों ने पंडीजी की पत्नी को चुप कराया और रोने का कारण पूछा। पंडीजी की पत्नी के बोलने से पहले ही पंडीजी स्वयं बोल पड़े की अब मैं सदा सदा के लिए आपके घर के इस सदस्य (पंडीजी) को छोड़कर जा रहा हूँ। अब आपलोगों को कष्ट देने कभी नहीं आऊँगा।


पंडीजी के इतना कहते ही पंडीजी की पत्नी बोल पड़ी, "आप जो भी हों, मेरी गल्तियों को क्षमा करेंगे, क्या मैं जान सकती हूँ की आप कौन हैं और मेरे पति को क्यों पकड़ रखे थे?" इतना सुनते ही पंडीजी बहुत जोर से हँसे और बोले मैं ब्रह्म-प्रेत (बरम-पिचाश) हूँ। मेरा कोई भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता और तेरे पति ने उसी पीपल के पेड़ को कटवा दिया था जिसपर मैं हजारों वर्षों से रहा करता था। इसने मेरा घर ही उजाड़ दिया था इसलिए मैंने भी इसको बर्बाद करने की ठान ली थी पर तुम लोगों की अच्छाई ने मुझे ऐसा करने से रोक लिया।


इस घटना के बाद से वे ब्रह्म-प्रेत महराजजी उस पंडीजी को छोड़कर सदा-सदा के लिए जा चुके हैं। आज पंडीजी एवं उनका परिवार एकदम खुशहाल और सुख-समृद्ध है। पर ब्रह्म-प्रेत महराज के जाने के बाद भी अगर कुछ बचा है तो उनकी यादें और विशेषकर उन सोखाओं के जेहन में जिनका पाला इस ब्रह्म-प्रेतजी से पड़ा था और जिसके चलते इन सोखाओं ने अपनी सोखागिरा छोड़ दी थी।


एक निवेदन करता हूँ प्रेत नहीं बनने वाला। एक तो पेड़ नज़र ही नहीं और अगर मजबूरी में कटता है तो एक के बदले दो भेजें। ताकि मेरा घर बचा रहे और आप लोगों का भी। क्योंकि अगर ऐसे ही पेड़ कटते हैं तो एक दिन प्रकृति असंतुलित हो जाएगी और शायद न आप बचेंगे न आपका घर भी। (एक पेड़ सौ पुत्र समान, एक तो काटो नहीं और यदि काटो ही हो तो उसका पहला दस-बीस निर्धारण।)

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