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परमात्मा का स्वरूप - डरावनी कहानियाँ
परमात्मा का स्वरूप - डरावनी कहानियाँ
परमात्मा का स्वरूप - डरावनी कहानियाँ
हरि, हर आदि बड़े – पुरुष पुरुष व दृष्टिकोण के सभी प्राणी दिन वंदना करते हैं, वह ही परमात्मा है|
जिसका सफेद काला आदि वर्ण, दुर्न्ध, सुगन्ध आदि गंध, कड़वा, मीठा, कट्टा, आदि रस, ठंडा, गर्म, रूखा, कठोर, कोमल, आदि स्पर्श तथा जन्म व मरण नहीं है वही चिदानंदस्वभाव परमात्मा है|
जिसका क्रोध नहीं, मोह और कुल जाति आदि का अभिमान नहीं वही निरंजन परमात्मा है जिसके पुण्य-पाप, राग-द्वेष नहीं, भूख-प्याष आदि एक भी दोष नहीं, वही परमात्मा है |
जिस शुद्ध आत्म स्वभाव में वस्तुगत सुख-दुःख- नहीं, विचार-विचारने का कोई व्यापार नहीं, वही शुद्ध आत्मा अर्थात परमात्मा है |
जो निर्मल ध्यान का विषय है, ऐसा देखने से पूर्व में सारे पाप नष्ट हो जाते हैं, वही परमात्मा है|
जन्म- मरण, लाभ-हानि, सुख-दुःख, शत्रु-मित्र में समान भाव रखनेवाले पुरुषों के मन में जो कुछ प्रकट होता है, वही परमात्मा है |
जिसका ना बंधन है ना संसार है और जो आत्मा सिद्धाश्रम में रहता है वही परमात्मा है
जो केवल दर्शन और केवल ज्ञानमयी है, जिसका केवल स्वभाव है और अनंत वीर्यवाला है वह ही परमात्मा है
जैसा निर्मल ज्ञानमय आत्मा सिद्धालय में रहता है वैसी ही निर्मल ज्ञानमय आत्मा देह में रहता है इन दोनों में कोई भेद नहीं है |
जैसे अनंत आकाश में एक नक्षत्र ही समस्त संसार को प्रकाशित करता है उसी प्रकार परमात्मा के केवल ज्ञान में तीन लोक दर्पण के समान प्रकाशित होते हैं|
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