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एक ऐसी प्रेम कहानी जिसे भुला दिया गया - #PASSG
एक ऐसी प्रेम कहानी जो टूट गई -
[00:00, 26/3/2023] पवन भाई: अघोरी साधुओं की रहस्यमयी दुनिया - डरावनी कहानियां
अहोरी बाबा अघोरी बाबा हिंदू धर्म के अघोर समुदाय से संबंध रखते हैं जो शिवजी की पूजा करते हैं ये समुदाय बहुत ही कम मात्रा में है लेकिन जो है वो अपने अनोखे व्यवहार, एकान्त प्रियता व् रहस्मय कार्यो के कारण बहुत प्रचलित है अहोरी लोगो अघोरी बाबा को इंसानों से दूर श्मशान घाटों, जंगलो या निर्जन स्थानों पर ज्यादा पसंद होता है | क्यूंकि जहा लोगो की जिंदगी खत्म हो जाती है वही से ये काली दुनिया के बादशाह अघोरी लोगो का जीवन शुरू होता है | ये लोग शव संसाधना को ही अपना मूल कर्तव्य मानते हैं कि अघोर संप्रदाय के साधक नर मुंडों की मुद्रा हैं और नर मुंडों को पात्र के तौर पर प्रयोग भी करते हैं। चिता के भस्म के शरीर पर लेपन और चिताग्नि पर व्यंजन बनाना आदि सामान्य कार्य हैं। ये असली रहस्य तो आज तक कोई नहीं जान पाया है | ये लोग मुर्दों में भगवान पूजते हैं |
ये लोग मोटे तौर पर मुर्दे के मांस के शौकिन होते हैं जिससे ये खोपड़ी के बने प्याले में फायदे और पीता है | क्योंकि अघोरी लोग इस तरह खोपड़ी में चौके अघोरी कर्म में आते हैं तथा ये सारे कर्म करने वाले ही सच्चे अघोरी हैं |ये लोग कच्चे मांस खाने से भी परहेज़ नहीं करते हैं | ये लोग प्रतिदिन जलती चिड़ियों से कई हिस्सों को खाने का काम करते हैं
वाराणसी या काशी को भारत के सबसे प्रमुख अघोर स्थान के तौर पर मानते हैं। भगवान शिव के स्वयं के नगरी होने के कारण यहां विभिन्न अघोर साधकों ने तपस्या भी की है। यहां बाबा कीनाराम का स्थल भी एक महत्वपूर्ण तीर्थ है। काशी के अतिरिक्त गुजरात के जूनागढ़ का गिरनार पर्वत भी एक महत्वपूर्ण स्थान है। जूनागढ़ को अवधूत भगवान दत्तात्रेय के तपस्या स्थल के रूप में जानते हैं।
अगोर समुदाय को करीब से जानने के लिए आज तक ने ऐसी जगहों पे जाकर उनका लाइव फुटेज बनाया जो इनके लिए काफी कठिन कार्य था | अगोरी कहते है की हम आत्माओ से बात कर सकते है |इस तरह संसार में इस तरह के विविध प्रकार के लोग संसार में सिर्फ भारत में ही देखने को मिलता है |
[00:02, 26/3/2023] Pawan bhayie: एक ऐसी प्रेम कहानी जिसे भुला दिया गया - डरावनी कहानियाँ
भारत कई अनूठी कहानियों और घटनाओं का साक्षी रहा है. यहां हर मोड़ पर कुछ ना कुछ ऐसा सुनने को जरूर मिल जाता है जो आपको हैरान कर देता है कि क्या वाकई ऐसा हो सकता है.आज हम आपको ऐसे ही एक स्थान के बारे में बताने जा रहे हैं जो अपनी अमर प्रेम कहानी के लिए जाना जाता है. ऐसी कहानी जो आज कई सदियों बाद भी ना सिर्फ याद की जाती है बल्कि आज के भौतिकवाद से ग्रस्त समाज में जहां प्यार को बस एक खेल की तरह खेला जा रहा है वहां प्यार के उस एहसास से रूबरू करवाती है जिसके लिए कभी लोग अपनी जान तक दे दिया करते थे.
यह कहानी मांडू की रानी रूपमती और बाज बहादुर की है. इतिहास के पन्नों में दर्ज मांडू (मध्य प्रदेश) स्थित रानी रूपमती का महल एक समय पहले तक बेहद खूबसूरत हुआ करता था, इतना कि कोई भी उसे देखकर अपनी आंखों पर विश्वास ना कर पाए कि क्या वाकई कोई इमारत इतनी बेहतरीन हो सकती है. इस महल के ऊपर मंडप बने हुए थे जहां बैठकर पूरा राज्य नजर आता था.
यह महल 365 मीटर ऊंची और सीधी खड़ी चट्टान पर स्थित है जिसका निर्माण बाज बहादुर ने करवाया था. ऐतिहासिक कहानियों के अनुसार रानी रूपमती सुबह-शाम मंडप पर बैठर सामने बहने वाली खूबसूरत नर्मदा नदी को देखा करती थी. महल के नीचे की ओर एक और महल है जिसे बाज बहादुर महल कहा जाता है और इस महल से रानी रूपमती का मंडप बहुत खूबसूरत नजर आता था. ऐसा माना जाता है कि जब रानी मंडप में होती थी, तब बाज बहादुर अपने महल के झरोखे से रूपमती को घंटों निहारा करता था.
सन 1561 की बात है जब मुगल बादशाह अकबर के सेनापति आदम खां ने मांडू पर आक्रमण कर बाजबहादुर को पराजित कर दिया और रानी रूपमती को अगवा कर लिया. रानी रूपमती ने आदम खां के समक्ष समर्पण नहीं किया और अपनी जान दे दी.
इस घटना के बाद रानी रूपमती और बाज बहादुर की प्रेम कहानी अमर हो गई और अकबर ने ही इन दोनों की प्रेम कहानी को लिखित रूप प्रदान करवाया.
मांडू में ना सिर्फ रानी रूपमती का महल चर्चा बटोरता है बल्कि यहां कई और भी स्थान हैं जो अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर हैं. मांडू की मस्जिदें भारतीय इस्लामी स्थापत्य कला की बेजोड़ उदाहरण हैं. इसके अलवा दो अन्य महल, जहाज महल और हिंडोला महल भी सौंदर्य के उत्कृष्ट नमूने हैं.
मांडू स्थित अशरफी महल की कहानी भी अजीब है। होशंगशाह ने सोने की अशर्फियों से इस महल का निर्माण किया था, जिसके कारण इसे अशर्फी महल का नाम दिया गया। मांडू की इसी भव्यता से प्रभावित सम्राट सम्राट जहांगीर यहां कई महीनों तक रहे और चप्पे-चप्पे का विचरण किया। उन्होंने अपने प्रवास के दौरान कई आश्वासनों का निर्माण नहीं बल्कि कई पुरानी इमारतों की छत भी करवाई।
वर्ष 1732 में मल्हार राव के नेतृत्व में मराठा सेना ने मांडू के मुगल गवर्नर को हराकर इस राज्य पर कब्जा कर लिया, तब से लेकर राजशाही के अंत तक मांडू पर मराठों का ही राज रहा। आजादी के बाद जब मांडू की रियासत पर सरकार का अधिपत्य हुआ तब यहां मालवा पर्यटन स्थल बनाए गए। मांडू की खूबसूरती का कोई सानी नहीं है यही वजह है कि आज यहां हर साल देश-विदेश के कई सैलानी आते हैं।
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