वह प्रेत जिसने कई सोखाओं को पीटा !

वह प्रीत जिसने कई सोखाओं को पीए ! डरावनी कहानियाँ



वह प्रीत जिसने कई सोखाओं को पीए ! डरावनी कहानियाँ

अध्याय क्रमांक 1

 भूत-प्रेतों की लीला भी अपरम्पार है। कभी-कभी ये बहुत ही सज्जनता से पेश आते हैं तो कभी-कभी ये उग्र रूप अच्छे-अच्छों की धोती दोस्ती कर देते हैं। भूत-प्रेतों में बहुत कम ऐसे होते हैं जो आसानी से दार्शनिकों में आ जाते हैं लेकिन ज्यादातर पंडितों-सोखों को पानी पिलाकर रख देते हैं, उनकी नानी की याद दिला देते हैं।


 

आज की कहानी एक ऐसे प्रेत की है जिसमें कोई भी सोखा-पंडित अपने दार्शनिक में नहीं पाया और ना ही उसे किसी देवी-देवता से ही डरता था। क्या वह प्रेत ही था या कोई और??? आने की कोशिश करते हैं। 

हमारी भी इस प्रेत को देखने की उत्कंठा अतितीव्र हो गई थी जब हमने पहली बार इसके बारे में सुना था। असली लोगों से पता चला कि इस प्रेत ने बहुत सारे सोखाओं-पंडितों को घिसरा-घिसराकर मारा और इतना ही नहीं 

 जब भी किसी देवी या देवता के स्थान को लेकर जाया जाता है तो उस देवी या देवता की भी फ्रैंक खिल्ली उड़ाई जाती है और उन्हें चुनौती देने वाले स्थलों को सबसे पहले पहचाना जाता है, मैं कौन??? और शायद यह कौन उत्तर किसी के करीब नहीं था, वह मूर्ति सोखा हो या किसी देवी या देवता का बहुत बड़ा भक्त या पुजारी हो।

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अभी से आप मत सोंचिए की यह कौन था जिसका पता बड़े-बड़े सोखा और पंडित तक नहीं लगा? इस कहानी को पढ़ने के बाद भी इस रहस्य से पर्दा नहीं उठेगा? इस रहस्यमयी प्रेत के 'पहचान में कौन' परदा उठेगा और यह परदा शायद वह प्रेत ही उगलेगा क्योंकि 


उनसे अच्छा मतलब कौन समझ सकता है। बस थोड़ा इंतजार करो और कहानी को आगे तो बढ़ाओ।

यह कहानी हमारे गाँव-जवार की नहीं है। ये कहानी है हमारे जिले के एक गांव की। यह गांव रौना के पास है। 


अब आप सोच रहे होंगे कि यह कहानी जब मेरे जिलों की नहीं है तो फिर मैं इसे कैसे सुन रहा हूं। मान्यवर इस गांव में मेरी रिश्ते की दास्तान हो सकती है लेकिन इस कहानी पर मैं भी अच्छी तरह से ब्यां कर सकता हूं।


भूत-प्रेतों की तरह से इस कहानी को रहस्यमयी न तोड़ते हुए मैं सीधी बात करता हूं। 


इस गांव में एक पंडित हैं जो बहुत ही सुशील, सभ्य और नेक इंसान हैं। यह कहानी घटीत से पहले तक ये पंडितजी एक बड़े माने-जाने ठीकेरे हुआ करते थे और ठीक के काम से ज्यादातर घर से दूर ही रहते थे। हप्ते या आखिरी दिन में उनके घर पर आना-जाना हुआ था।


 ये ओके लेकर सड़क आदि का काम करते थे। इनके घर के सभी लोग भी बड़े ही सुशिक्षित एवं सज्जन प्रकृति के आदमी हैं। यूक्रेनी पत्नी तो साधु स्वभाव की हैं और एक कुशल गृहिणी होने के साथ ही बहुत ही धर्मनिष्ठ हैं।


एक बार की बात है कि पंडितजी ठीक से काम से बाहर थे दो दिन के बाद ही दो लोग अपने घर आए। पंडितजी के दोस्तों को उन दो लोगों ने बताया कि पता नहीं क्यों कल से ही पंडितजी कुछ अजीब हरकतें कर रहे हैं।


 जैसे कल रात को सात ईसा मसीह ने अपने लिए खाना बनाया था और ये जिद करके उन लोगों के साथ ही खाना खाने बैठे ईसा मसीह ने कहा था कि पंडितजी पहले आप खा लें फिर हम खाएंगे। और इसके बाद जब ये खाना खाने बैठे तो सातों मजदूर अकेले खाना खा गए और फिर ये खाना भी कोई इंसान नहीं खा रहा था। 

 

उसके बाद दो मजदूर तो डरकर वहां से भाग ही गए। फिर हम लोगों को पता चला। उसके बाद हम लोग भी वहां पहुंचे और किसी तरह की सुलाए और सुबह ही बंदूक के लिए व्यक्ति को निकल पड़े।


इसके बाद वे दोनों व्यक्ति चले गए और पंडित जी भी आराम से अपने प्रतिष्ठान में चले गए। कुछ देर बाद पंडीजी लुंगी लपेटे घर से बाहर आईं और गर्लफ्रेंड के साथ मन करने के बावजूद भी चुपचाप की ओर निकल गईं। 


एक शख्स ने भी (इनके घर के छोटे भाई) चुपचाप से पीछे-पीछे की ओर रुख किया। जब पंडीजी गाँव से बाहर निकले तो अपने ही आम के घर में चले गये। आम के आर्केस्ट्रा में कुछ समय लगा तो पंडित जी चल रहे थे पर पता नहीं अचानक क्या हुआ कि आम के नीचे झूलती हुई 


मोटी-मोटी डालियों को ऐसे तोड़ने लगे जैसे हनुमान जी का बल आ गया हो। डालियों के टुकड़ों की आवाज सुनकर हैरान रह गए ये छोटे भाई दौड़ते हुए कलाकार और कलाकारी में ऐसा करने से रोके गए। जब इनके छोटे भाई ने बहुत ही मान-मनौव्वल की तो पंडितजी थोड़ा शांत हो गए और घर वापस आ गए।


इस घटना के बाद तो पंडितजी के पूरे परिवार के साथ ही उनके गांव में भी संशय में रहने लगा। एक दिन फिर क्या हुआ की पंडीजी अपनी ही इकॉनमी में अपने बच्चे को पढ़ रही थीं और दूसरी पत्नी यहां रामायण पढ़ रही थीं 


उनकी पत्नी ने क्या बनाया है कि पंडीजी का शरीर फूलती जा रही है और चेहरा भी गुस्से से लाल होता जा रहा है। अभी पंडीजी की पत्नी कुछ समझती है तब तक पंडीजी अपने ही बेटे का सिर अपने मुंह में लेकर ऐसा लग रहा था कि जैसे चौबजा जाएंगे पर उनकी पत्नी डरी नहीं और सभ्य भाषा में बच्चे को छोड़ कर विनती की तरह। 


अचानक पंडितजी के बच्चे का सिर मंद से शांत होना और अचानक बच्चे का सिर हिलाने लगे।

इस घटना के बाद तो पंडितजी के दांतों की चेन और नींद ही हराम हो गई। वे लोग पूजा-पाठ चित्रण के साथ ही सभी डॉक्टरों से संपर्क भी करते हैं।


 यहाँ तक कि कई बड़े-बड़े समूह में डॉक्टरों की कोई भी दवा का काम नहीं दिखाया गया है और यहाँ एक-दो दिन पर ही पंडितजी कोई भी भयानक काम नहीं कर सकते हैं। डॉक्टरों से डॉक्टरों का निर्देशन लगभग 2 महीने तक पंडितजी के मुद्दे पर जारी रहा, नाममात्र में सुधार भी नहीं हुआ।


हाँ अब स्पष्ट समझ में एक बात आई थी और उसने कहा था कि जब भी पंडितजी की फूली हुई देह थी और उनके चेहरे से तमतमाने लग रहा था तो घर वाले उनकी पत्नी को बुलाते थे और पंडितजी अपनी पत्नी को देखते ही शांत हो जाते थे।


एक दिन पंडितजी की पत्नी पूजा कर रही थी, उसी दिन पंडितजी वहां गए और उनकी पत्नी से साकर ने पूछा कि तुम पूजा क्यों कर रही हो? पंडितजी की पत्नी ने कहा कि तुम अच्छी हो, इसलिए। अपनी पत्नी की बात सुनकर पंडितजी ठहाका मार कर हंसने लगे और हंसते-हंसते अचानक बोल पड़े


 पढ़े की भी पूजा-पाठ कर लो पर मैं इसे छोड़ने वाला नहीं हूं अगर मैं इसे छोड़ूंगा तो इस लोक से इसे छोड़ दूंगा। पंडित जी की ये बात सुनकर हैरान रह गए पंडित जी की पत्नी सहमीं तो जरूर पर उन्होंने पूछा कि आप कौन हैं और मेरी पत्नी ने आपका क्या बनाया



 इसपर पंडितजी ने कहा कि मैं कौन हूं यह मैं नहीं जानता और मेरा किरदार क्या है मैं यह भी नहीं बताऊंगा।

पंडित जी की पत्नी ने जब यह अपने दोस्तों को बताया तो पंडित जी के दोस्तों ने उस जवार में राय सोखा-पंडित से सबसे संपर्क करना शुरू कर दिया। 


पहले तो कुछ सोखा-पंडितों ने झाड़-फूंक करवाकर कुछ फायदा नहीं उठाया। एक दिन पंडितजी के साथी ने पंडितजी को लेकर एक ही जवार (क्षेत्र) के एक नामी सोखा के पास पहुंचे। सोखाबाबा कुछ मंत्र बुदबुदाए और पंडितजी की ओर देखते हुए बोले कि तुम भी हो जाओ पर पत्थर इसे 


ठीक हो जाना ही नहीं होगा तो मैं स्थिर राख भस्म कर दूँगा। जब सोखा ने भस्म करने की कहा तो पंडितजी का चेहरा तमतमा उठा और वहीं सोखा को कपड़े की तरह पटक-पटककर मारने लगे। सोखा की सारी शेखी रफूचक्कर हो गई थी और वह गिड़गिड़ाने लगा था। फिर पंडितजी की पत्नी ने बीच-बचाव किया और सोखा की जान बचाई।


पंडीजी द्वारा सोखा के खिलाफ़ की खबर आग की तरह पूरे जवार में कई असुरों में सुनाई गई। अब तो किसी पंडित या पंडित ने उस पंडित से चयन तो दूर उनका नाम सुना ही कांपने लगा था। इसी दौरान पंडितजी को लेकर एक देवी मां के स्थान पर देवी मां (देवी मां जिस महिला के ऊपर वास करती थीं) पर पहुंच गईं


 उस महिला ने देवी-वास के समय) ने साफ मना कर दिया कि वे दुष्ट और असभ्य व्यक्ति के मुंह भी नहीं लगना चाहते। पंडीजी उस स्थान पर अपीलकर मुस्कुरा रही थीं और अपनी पत्नी से बोलीं कि जो देवी मेरे सामने आने से घबरा रही है वह मुझसे क्या भागेगी? 

 

देवी माँ ने पंडितजी के साथियों से कहा कि यह कौन है, इसे पहचानना भी मुश्किल है। आप लोग इसे लेकर बड़े-बड़े तीर्थ-स्थानों पर जा सकते हैं कि यह पंडितजी को छोड़ दे।


इसके बाद पंडितजी के घरवाले पंडितजी को लेकर बहुत सारे तीर्थस्थल (जैसे मैहर, विंध्याचल, काशी, थावें, कुछ नामी मजार आदि) पर गए तो कुछ भी फ़ायदा नहीं हुआ। यहां तक ​​की अब पंडितजी अपने मित्रों के साथ इन तीर्थों पर आसानी से जा रहे हैं और मिले रहे हैं। 


अधिकांश तीर्थ-स्थान घूमने के बाद भी जब वह प्रेत पंडितजी को विदा नहीं करते तो पंडितजी के घरवाले घर पर ही दैनिक पूजा-पाठ प्रारम्भ करते हैं। पंडीजी की पत्नी प्रतिदिन व्रत पालन दुर्गा सप्तशती का पाठ करना।


एक दिन पंडित जी अपने दोस्तों को अपने पास बुलाएं और बोलें कि आप सभी लोग हुक्म में व्यापारी कम से कम एक-एक पीपल का पेड़ लगा लें। पंडितजी की पत्नी ने कहा कि अगर आपकी यही इच्छा है तो एक-एक क्या हम लोग दस-ग्यारह पीपल का पेड़ लगाएंगे। 





इसके बाद पंडितजी के घरवाले पंडितजी को साथ लेकर एक ही दिन में गए और इधर-उधर से एक-एक पीपल का पेड़ ढूंढा और पंडितजी से बोले कि हमलोग समान पीपल का पेड़ गठबंधन।


इस घटना के बाद पंडितजी थोड़ा शांत रह गए थे। अब वे अपने घर का छोटा-मोटा काम भी करने लगे थे। एक दिन पंडितजी के बड़े भाई घर के दरवाजे पर लकड़ी के पौधे रख रहे थे। पंडीजी वहां पहुंच कर तांगी अपने हाथ में ले लें और देखें ही नजर लकड़ी की तीन मोटी सिलियों को नीचे दे दें।


 शायद इन तीन सिल्लियों को उनके भाइयों के महीनों में स्ट्रॉचने दिया गया।

एक दिन लगभग सुबह के चार बजे होंगे कि पंडितजी ने अपनी पत्नी को जगाया और बोल पड़े, "मैं जा रहा हूं।" पंडित जी की पत्नी बोल पड़ीं, 


"अभी तो रात है और इस रात में तुम कहाँ रहोगे?" मेरी पत्नी की यह बात सुनकर पंडित जी हँसे और बोले, "मैं जा रहा हूँ और वह भी अकेली है। तुम्हारी शादी करीब है। अब मैं तुम्हारे पति और तुम्हारे घर वालों से कभी तंग नहीं चाहता। तुम जल्दी से अपनी पूरी गर्लफ्रेंड को जगवाओ।" इसलिए जाने से पहले मैं उन सबसे भी मिल लूँ।"


 पंडित जी के इतना ही कहते हैं पंडित जी की पत्नी की आंखों से झर-झर झर-झर झरते झरने और वे पंडित जी का पैर अमोनियम भारी तेज रोना। अब तो पंडितजी की पत्नी के रोने की आवाज सुनकर घर के लोग वही हो गए और भागकर पंडितजी के कमरे में पहुंच गए। 

 

अरे यह क्या पंडित जी का कमरा तो बिल्कुल अच्छा था क्योंकि पंडित जी तो मुस्कुराए जा रहे थे। दोस्तों ने पंडितजी की पत्नी से चिप्स के टुकड़े और रोने का कारण पूछा। पंडितजी की पत्नी के बोलने से पहले ही पंडितजी स्वयं पड़े की अब मैं सदा सदा के लिए आपके घर के इस सदस्य (पंडीजी) को ठीक करने जा रहा हूं। अब आप लोगों को कष्ट देना कभी नहीं आऊंगा।


पंडितजी के इतना कहते ही पंडितजी की पत्नी ने कहा, "आप जो भी बोल रहे हैं, मेरी गलतियों को माफ करेंगे, क्या मैं जान सकता हूं कि आप कौन हैं और मेरे पति को क्यों पकड़ रखा था?" इतना सुना है पंडितजी बहुत जोर से हंसे और बोले मैं ब्रह्म-प्रेत (बर्म-पिचाश) हूं।


 मेरा भी कुछ नहीं बन पाया और तेरे पति ने पीपल के पेड़ को कटवा दिया था जिसपर मैं हजारों साल से रह रहा था। मेरा घर ही उजाड़ दिया था इसलिए मैंने भी तोड़फोड़ करने की तान ली थी आप लोगों की पसंद ने मुझे ऐसा करने से रोक लिया।


इस घटना के बाद वे ब्रह्म-प्रेत महाराजजी से मिले जो पंडितजी को सदा-सदा के लिए ठीक करने जा रहे थे। आज पंडितजी और उनका परिवार एकदम खुशहाल और सुख-समृद्ध है। ब्रह्म-प्रेत महाराज के जाने के बाद भी अगर कुछ बचा है


 तो उनकी यादें और मशीनें उन सोखाओं के जहां में बनाई गईं, इस ब्रह्म-प्रेतजी से मिलीं और सोखाओं ने अपना सोखागिरा छोड़ दिया था।

एक निवेदन है मैं प्रेट बीअर नहीं मैन बीअर। 


एक तो पेड़ का पैटर्न ही नहीं और अगर जबरदस्ती में कैट भी पड़ जाए तो एक के बदले दो लगा दीजिए। ताकि मेरा घर बचा रहे और आप लोगों का भी। क्योंकि अगर ऐसे ही पेड़ काटते रहे तो एक दिन प्रकृति असंतुलित हो जाएगी और शायद आप बचेंगे न आपके घर भी।


 (एक पेड़ सौ पुत्र समाना, एक तो काटन नहीं और अगर काटन ही हो तो उसकी पहली दस-बीस चलना।)


 



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